: विवाह के बाद मनाया गया कलेवा, गीतों पर झूमते रहे श्रद्धालु
Wed, Dec 20, 2023
चक्रवर्ती सम्राट राजा दशरथ जी के राजमहल बड़ा स्थान में रामकलेवा के साथ सीताराम विवाह महोत्सव का हुआ समापन
अयोध्या। वैष्णव नगरी अयोध्या में उपासना की दो अलग-अलग शाखाएं हैं। इन शाखाओं में दास परम्परा और सख्य परम्परा शामिल है। मिथिला धाम से अपना रिश्ता जोड़ने वाले मधुरोपासक कहलाते हैं और सख्य भाव से राम व सीता के रूप में दूल्हा-दुलहिन सरकार की उपासना करते हैं। इन दोनों ही परम्पराओं के उपासक संत रामानंद सम्प्रदाय के प्रथम आचार्य के रूप में देवी सीता जी को ही स्वीकारते हैं। गुरु वंदना में सीतानाथ समारम्भाम् रामानंदार्य मध्यमाम अस्मादचार्य पर्यन्ताम वंदे श्रीगुरु परम्पराम् इसी श्लोक का वाचन किया जाता है। फिर भी दास परम्परा के उपासक राजा राम व हनुमान जी की उपासना दास यानी कि सेवक भाव से करते हैं। इसके समानान्तर सख्य भाव के उपासक सखी भाव की गुप्त उपासना करते हैं। इन संतों की मान्यता है कि जनकपुर में विवाह के बाद भगवान दुलहिन सरकार के साथ दूल्हा सरकार के रूप में ही विराजते हैं। यही कारण है कि ये उपासक श्रीरामचरित मानस के पारायण के दौरान विवाह प्रसंग तक का ही पारायण करते हैं। पूजन-अर्चन के दौरान सिर पर पल्लू रखकर त्रिरयोचित भाव से ही आराध्य को रिझाते हुए उनसे अनुनय-विनयपूर्वक प्रत्येक क्रिया करते हैं।
रामनगरी में पिछले पांच दिनों से चल रहे राम विवाह महोत्सव में आज आखरी दिन कलेवा का कार्यक्रम किया गया। जिसमे भगवान राम और तीनो भाइयो को उपहार देकर विदाई के समय गाली देकर विदा किए जाने का कार्यक्रम किया गया। भगवान की जनक पूरी से विदाई के लिए महिलाएं भगवान राम के अचर धराई किया गया जिसमें दूरदराज से अयोध्या पहुंचे। राजा दशरथ जी के राजमहल बड़ास्थान के बिंदुगाद्याचार्य स्वामी देवेंद्र प्रसादाचार्य जी ने भगवान को कलेवा कराया। इसके बाद कार्यक्रम के संयोजक बिंदुगाद्याचार्य के कृपापात्र शिष्य मंगल भवन व सुंदर सदन पीठाधीश्वर महंत कृपालु राम भूषण दास जी महाराज ने भी भगवान के स्वरुपों को कलेवा कराया।
: श्रीसीताराम विवाह केवल उत्सव नही रसिकों का उपास्य है: रामानुजाचार्य
Mon, Dec 18, 2023
चक्रवर्ती सम्राट राजा दशरथ जी के राज महल बड़ा स्थान में निकली भगवान राम की राजशी बारात, राजा दशरथ बन बिंदुगाद्याचार्य स्वामी देवेंद्रप्रसादाचार्य जी महाराज लुटा रहें थे नेग
कार्यक्रम के संयोजक सुंदर सदन पीठाधीश्वर महंत कृपालु राम भूषण दास बारातियों का कर रहें थे अभिनन्दन
अयोध्या। रामनगरी में सीताराम विवाहोत्सव आज अपने चरम रहा। हर तरफ भगवान राम के बारात में शामिल होने के लिए लोगों में होड़ मची रही। रामकोट स्थित चक्रवर्ती सम्राट राजा दशरथ जी के राज महल बड़ा स्थान में राम बारात निकलने से पहले रामकथा में भक्तों की भारी भीड़ उमड़ी। राम कथा के षष्ठम् दिवस जगद्गुरु रत्नेशप्रपन्नाचार्य ने कहा कि श्रीसीताराम विवाह केवल उत्सव नही रसिकों का उपास्य है।जहां उपासक काल के बंधन से ऊपर उठकर उपास्य से तादात्म्य स्थापित करके स्वयं को उस काल में पहुँचा देता है। श्रीसीताराम जी के विवाह की लीला महामंगल की लीला है जिसके श्रवण-दर्शन से जीवन मंगलमय होता है। उन्होंने कहा कि भगवान श्रीसीताराम जी के विवाह ने ही दुनिया को विवाह संस्कार का आदर्श सिखलाया। भारतीय संस्कृति में श्रीराम-सीता आदर्श दंपति हैं। जगद्गुरु जी ने कहा कि श्रीरामचन्द्रजी के दूलह-वेष पर रसिक जन निछावर हो जाते हैं। प्रभु का श्याम शरीर स्वाभाविक सुन्दर एवं कोटि काम की शोभा को लज्जित करने वाला है।महावर से युक्त चरण शोभा दे रहे हैं जिनमें मुनियों के मनरूपी मधुप छाये रहते हैं। कटि में पुनीत पीत धोती,कर मुद्रिका चित्त को चुरा लेती है।ब्याह के साज से शोभित हैं।छाती चौड़ी है उसपर उरभूषण विराजमान है।मणि मोती मण्डित पीला दुप्पट्टा काखाँ-सोती पड़ा है।कानों में कुण्डल,भृकुटी सुन्दर,नासिका मनोहर,मस्तक पर तिलक सुन्दरता का निवास स्थान है।माथे पर मंगलमय मणि मुक्ताओं से गुँथा हुआ मौर सोह रहा है।सुन्दर मौर में महामणि गुँथे हुये हैं।सभी अंग चित्त को चुराने वाले हैं।रामानुजाचार्य जी ने कहा कि विवाह ऐसा संस्कार है जिसे प्रभु श्रीराम और कृष्ण ने भी अपनाया। भगवान राम ने अहंकार के प्रतीक धनुष को तोड़ा। यह इस बात का प्रतीक है कि जब दो लोग एक बंधन में बंधते हैं तो सबसे पहले उन्हें अहंकार को तोड़ना चाहिए और फिर प्रेम रूपी बंधन में बंधना चाहिए। यह प्रसंग इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि दोनों परिवारों और पति-पत्नी के बीच कभी अहंकार नहीं टकराना चाहिए क्योंकि अहंकार ही आपसी मनमुटाव का कारण बनता है।महोत्सव की अध्यक्षता बिंदुगाद्याचार्य स्वामी देवेंद्रप्रसादाचार्य जी महाराज कर रहें व दिव्य संचालन मंगल भवन व सुंदर सदन पीठाधीश्वर महंत कृपालु राम भूषण दास कर रहें। कथा में सौकड़ों संत साधक मौजूद रहें।
: युगों बाद भी जीवंत है सीता-राम विवाह की स्मृति: महंत जगदीश दास
Mon, Dec 18, 2023
अयोध्या। युगों बाद भी जीवंत है सीता-राम विवाह की स्मृति
रामनगरी में उसकी स्मृति युगों बाद भी जीवंत है। रामानुरागी संत प्रति वर्ष अगहन शुक्ल पंचमी के दिन सीता-राम विवाह का उत्सव पूरे भव और वैभव से मनाते हैं
मां सीता एवं भगवान राम का विवाह त्रेता में हुआ था पर रामनगरी में उसकी स्मृति युगों बाद भी जीवंत है। रामानुरागी संत प्रति वर्ष अगहन शुक्ल पंचमी के दिन सीता-राम विवाह का उत्सव पूरे भव और वैभव से मनाते हैं। इस मौके पर अवध एवं मिथिला की लोक संस्कृति के अनुरूप विवाह की सभी रस्में होती हैं। विवाह का मंडप सजता है, माड़व गड़ता है, तिलक चढ़ता है, बरात निकलती है, द्वारचार के उपरांत सप्तपदी और कलेवा होता है।
रामनगरी में ऐसा करने वाले संतों की भरी-पूरी धारा है, जिन्हें रसिक अथवा मधुर उपासना परंपरा का माना जाता है। वे मां सीता के बिना आराध्य राम की कल्पना भी नहीं करते और ऐसे में सीता-राम विवाह की स्मृति उनके लिए पूरी गहनता से अक्षुण है। नगरी के प्रसिद्ध पीठों में शुमार श्री हनुमान बाग पीठाधीश्वर महंत जगदीश दास महाराज के अनुसार यह मात्र परंपरा का पालन ही नहीं है, बल्कि सीता-राम विवाहोत्सव में अपूर्व तात्विकता भी निहित है। संतों की मान्यता है कि सीता-राम विवाह भक्ति का भगवान से परिणय है। वे विवाहोत्सव की स्मृति के साथ भगवान से अपने संबंधों को पुष्ट करते हैं।
राम विवाहोत्सव का जिक्र होने पर हनुमान बाग का नाम बरबस उभरता है। क्योंकि रीति रिवाज के साथ राजशी टाठ बाट से पूरा विवाह महोत्सव मनाया जाता है।
जगत नियंता भगवान श्री राम अपने अनुजों समेत सजधज कर निकले अपनी बारात। चहुंओर हर कोई नाचते गाते निकले भगवान की बारात। हाथी घोड़े ऊट बैडबाजे बारात की शोभा बड़ा रहे थे। हर शक्स खुशी में झूमता नजर आ रहा था। अपने आराध्य के शादी का जश्न लोगों के सर चढ़ बोल रहा था। बड़े ठाटबाट से निकली भगवान श्रीराम लक्ष्मण भरत शत्रुघ्न की बारात और उतने ही ठाटबाट से निकले भगवान के बाराती।
मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम की नगरी अयोध्या में राम विवाह उत्सव लगभग सप्ताह भर से चल रहा है वही विवाह पंचमी के शुभ अवसर पर भगवान श्री राम और जनकनंदिनी सीता का विवाह कार्यक्रम होता है इस मौके पर अयोध्या के मठ मंदिरों से बारात निकाली जाती है। जिसमे एक मंदिर से में बारात लेकर प्रतीकात्मक रूप से जनकपुर बनाए गए दुसरे मंदिर तक पहुचती है जहां चारो भाई राम लक्ष्मण भरत और शत्रुघन सहित सभी बारतियो का स्वागत किया गया।
प्रसिद्ध पीठ श्री हनुमान बाग का विवाहोत्सव भी बड़ा सुंदर व देखने योग्य रहा। महंत जगदीश दास जी महाराज के अगुवाई में सजधज कर निकले बाराती फिजाओं में चार चांद लगा रहे थे। बारात में भगवान शंकर, हनुमानजी के स्वरूप पूरे माहौल को भक्ति मय कर रहें थे। बारात की अगुवाई खुद हनुमान बाग पीठाधीश्वर महंत जगदीश दास महाराज कर रहें थे। उनके साथ रामनगरी के विशिष्ट संत भी भगवान राम के बाराती बन नाचते गाते जा रहे थे। इस मौके पर महंत नंदराम दास, गद्दी नशीन जी के शिष्य संत मामा दास, उपेंद्र दास, लवकुश दास सहित सैकड़ों संत मौजूद रहें। व्यवस्था में पुजारी योगेंद्र दास, सुनील दास, रोहित शास्त्री,नितेश शास्त्री सहित हनुमान बाग से जुड़े शिष्य परिकर लगे रहे।