Tuesday 8th of September 2026

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महंत भवनाथ दास हनुमानगढ़ी के सरपंच रहे, समाजवादी संत सभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी थे

हनुमानगढ़ी में विधि-विधान से की पूजा, श्रीराम जन्मभूमि मंदिर में देश-प्रदेश की खुशहाली की कामना की

सम्मानित किए गए एक दर्जन मेधावी छात्र व उनके संघर्षों के साथी

पीठाधीश्वर श्रीमहंत रामजी दास जी की अध्यक्षता एवं अधिकारी महंत रामनारायण दास के संयोजन में मनाई गई श्रीकृष्ण जन्माष्टमी

तोताद्रिमठ पीठाधीश्वर जगद्गुरु रामानुजाचार्य अनंताचार्य महाराज के सानिध्य में धूमधाम से मना भगवान श्रीकृष्ण जन्माष्टमी

सुचना

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: भगवान राम मर्यादा का पालन और कर्तव्यपरायणता की मूर्ति है: प्रभंजनानन्द शरण

बमबम यादव

Tue, Jan 23, 2024

सियाराम किला झुनकी घाट के प्रथम आचार्य परम पूज्य महंत मिथिलाशरण महाराज का हुआ प्राण प्रतिष्ठा

अयोध्या। मां सरयू के पावन तट पर सुशोभित प्रसिद्ध पीठ सियाराम किला झुनकी घाट में समारोह पूर्वक वैदिक आचार्यो की देखरेख में प्रथम आचार्य परम पूज्य महंत मिथिलाशरण महाराज का प्राण प्रतिष्ठा हो गई। इसी के साथ कार्यक्रम समापन की ओर आ गया। बुधवार को भंडारे के साथ प्राण प्रतिष्ठा महोत्सव का समापन हो जायेगा। महोत्सव में प्रतिदिन हवन कुंड में आहुतियां डाली जा रही है। तो देर शाम मंदिर में श्री रामकथा की अमृत वर्षा प्रख्यात कथा वाचक स्वामी प्रभंजनानन्द शरण जी महाराज कर रहें है। व्यासपीठ से कथा के कम को आगे बढ़ते हुए प्रभंजनानन्द शरण ने कहा कि भगवान श्रीराम नीति के प्रतीक हैं। उन्होंने नीतिनिष्ठा की स्थापना के लिए अवतार लिया और आजीवन उसका प्रशिक्षण अपने व्यवहार द्वारा करते-कराते रहे। उन्हें सद्गुणों की खान भी कहा गया है। मर्यादा का पालन और कर्तव्यपरायणता में सदा उन्होंने अपना अनुकरणीय आदर्श प्रस्तुत किया। इन्हीं विशेषताओं के कारण उन्हें पुरुष रूप में पुरुषोत्तम, नर रूप में नारायण कहा जाता है। श्रीराम की प्रीति अंधी भावुकता नहीं, वरन नीति पर आधारित है। उनका कोई मित्र नहीं, कोई शत्रु नहीं, वे नीति से प्रीति रखते हैं। जहां नीति का जितना अंश होगा, वहां उनकी प्रीति भी उस अनुपात में बढ़ेगी। प्रभु श्रीराम की नीतिनिष्ठा अद्वितीय है। श्रीराम अपने पुरुषार्थ का बखान स्वयं नहीं करते, वानरों को गुरु वशिष्ठ का परिचय कराते हुए कहते हैं कि इनकी कृपा से ही हम असुरों को मारने में समर्थ हुए। साथ ही वशिष्ठ जी से वानरों के बारे में कहते हैं कि समर सागर में इन्हीं ने सेतु बनाकर हमें पार कराया। ये लोग मुझे भरत के समान प्रिय हैं। इस संवाद में विनयशीलता, कृतज्ञता और निरंहकारिता का सुंदर समन्वय है। श्रीराम यश कामना से दूर रहते हैं। स्वयं को सर्वश्रेष्ठ मानने की प्रवृत्ति को ठीक नहीं मानते हैं। श्रीराम वनवास को अपना बड़ा कार्यक्षेत्र मानते हैं। कार्यक्रम की अध्यक्षता झुनकी पीठाधीश्वर महंत करुणानिधान शरण जी महाराज कर रहें।

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