Thursday 3rd of September 2026

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नव संवत्सर की पूर्व संध्या पर रामकोट परिक्रमा, महाराज विक्रमादित्य की : रामनगरी के पुनरुद्धार से जुड़े महानायक विक्रमादित्य को श्रद्धा, परंपरा और आस्था के साथ किया जाएगा स्मरण

नव संवत्सर की पूर्व संध्या पर रामकोट परिक्रमा, महाराज विक्रमादित्य की स्मृति होगी जीवंत

रामनगरी के पुनरुद्धार से जुड़े महानायक विक्रमादित्य को श्रद्धा, परंपरा और आस्था के साथ किया जाएगा स्मरण

अयोध्या। चैत्र शुक्ल प्रतिपदा के पावन अवसर पर भारतीय लोक परंपरा के महान नायक महाराज विक्रमादित्य की स्मृति एक बार फिर जीवंत हो उठती है। नव संवत्सर के प्रवर्तक माने जाने वाले विक्रमादित्य भले ही उज्जयिनी के राजा रहे हों, लेकिन रामनगरी अयोध्या से उनका गहरा और ऐतिहासिक संबंध रहा है। यही कारण है कि प्रत्येक वर्ष नव संवत्सर की पूर्व संध्या पर अयोध्या के हृदयस्थल रामकोट क्षेत्र की परिक्रमा की परंपरा निभाई जाती है। इस वर्ष भी बुधवार को रामकोट परिक्रमा के साथ नव संवत के स्वागत का उल्लास पूर्व संध्या से ही पूरे शहर में झलकेगा।

महाराज विक्रमादित्य को एक महान, पराक्रमी और यशस्वी शासक के रूप में तो जाना ही जाता है, साथ ही उन्हें अयोध्या के जीर्णोद्धार कराने वाले महानायक के रूप में भी विशेष सम्मान प्राप्त है। अयोध्या के इतिहास का उल्लेख करने वाले विभिन्न प्राचीन ग्रंथों के अनुसार, एक समय वे आखेट करते-करते सरयू तट स्थित इस प्राचीन नगरी तक आ पहुंचे। उस समय तक अयोध्या अपनी पूर्व की भव्यता और पहचान काफी हद तक खो चुकी थी।

बताया जाता है कि सरयू तट पर उनकी भेंट तीर्थराज प्रयाग से हुई। तीर्थराज प्रयाग ने ही उन्हें अयोध्या की प्राचीन महिमा, सरयू नदी के महत्व और भगवान राम से जुड़े पावन स्थलों की जानकारी दी। उन्होंने विक्रमादित्य को इस नगरी को पुनः स्थापित करने तथा रामजन्मभूमि सहित अन्य प्रमुख स्थलों की पहचान सुनिश्चित करने का मार्ग भी सुझाया।

इतिहास और मान्यताओं के अनुसार, भगवान राम के पुत्र कुश की 44वीं पीढ़ी के राजा वृहद्वल तक अयोध्या वैभवशाली बनी रही। किंतु महाभारत युद्ध में अभिमन्यु के हाथों वृहद्वल के निधन के बाद यह नगरी धीरे-धीरे अपने गौरव से वंचित होती चली गई। जब विक्रमादित्य अयोध्या पहुंचे, तब वे इसे पहचान तक नहीं सके थे।

इसके बाद विक्रमादित्य ने अयोध्या के प्रमुख स्थलों की पहचान कराई और संपूर्ण नगर का भव्य जीर्णोद्धार कराया। मान्यता है कि उन्होंने राम जन्मभूमि पर एक अत्यंत भव्य मंदिर का निर्माण भी कराया था। हालांकि बाद के कालखंड में, विशेष रूप से 12वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में, कान्यकुब्ज के शासक जयचंद ने उस मंदिर से विक्रमादित्य के नाम का शिलापट हटवाकर अपना नाम अंकित करा दिया, लेकिन मंदिर की मूल संरचना यथावत बनी रही।

इतिहास में यह भी उल्लेख मिलता है कि 1528 में मुगल शासक बाबर द्वारा जिस मंदिर को ध्वस्त किया गया, उसका निर्माण भी विक्रमादित्य द्वारा ही कराया गया था। इसके अतिरिक्त, वर्ष 1902 में एडवर्ड तीर्थ विवेचनी सभा ने अयोध्या के त्रेतायुगीन कुंडों और अन्य पौराणिक स्थलों को चिह्नित कर संरक्षित किया, जिन्हें कभी विक्रमादित्य ने नवजीवन प्रदान किया था।

इस प्रकार, नव संवत्सर के आगमन के साथ अयोध्या में न केवल नए वर्ष का स्वागत होता है, बल्कि उस महान शासक की स्मृति भी पुनर्जीवित होती है, जिसने इस पावन नगरी को उसके खोए हुए वैभव से पुनः परिचित कराया।

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