: बड़ा भक्त माल आश्रम में बह रही गीत-संगीत की वैतरणी,मंदिर में झूलनोत्सव की बिखरी छटा
Sat, Aug 2, 2025
बड़ा भक्त माल आश्रम में बह रही गीत-संगीत की वैतरणी,मंदिर में झूलनोत्सव की बिखरी छटायुगल सरकार के झूलनोत्सव की परंपरा अनादिकाल से चली आ रही: महंत अवधेश दासअयोध्या। झूलन में आज सज-धज के युगल सरकार बैठे हैं..। झूला झूलें अवधबिहारी संग जनकदुलारी..। प्यारी संग झूलत प्रीतम प्यारो.. यह बोल हैं प्रसिद्धपीठ श्री बड़ा भक्त माल आश्रम मंदिर में चल रहे श्रावण झूलन महोत्सव के। जहां युगल सरकार के झूलनोत्सव अपने चरम पर है। आश्रम में स्वरुप सरकार का भव्य झूलनोत्सव होता है।
श्री बड़ा भक्त माल आश्रम के वर्तमान पीठाधिपति श्रीमहंत अवधेश दास महाराज के कुशल मार्गदर्शन में प्रतिदिन युगल सरकार के झूलन महोत्सव की झांकी सज रही है। भगवान के झूलन झांकी का दर्शन कर साधु-संत, भक्तजन पुण्य के भागीदार बन रहे हैं। मठ में नित्य सायंकाल आरती-पूजन पश्चात युगल सरकार के झूलन की सुभव्य झांकी सज रही है, जिसका सिलसिला देररात्रि तक चल रहा है। अयोध्या समेत अन्य जगहों से पधारे गायक कलाकार विभिन्न विभिन्न झूलन गीतों से झूलनोत्सव की शोभा बढ़ा रहे हैं। कलाकारों द्वारा झूलन महोत्सव में चार-चांद लगाया जा रहा है। वह उत्सव की महफिल भी सजा रहे हैं। इससे साधु-संत, श्रोता एवं भक्तगण मंत्रमुग्ध होकर खुशी से झूमने को आतुर हैं। पूरा बड़ा भक्त माल आश्रम का प्रांगण झूलनोत्सव के उल्लास में डूबा हुआ है। जहां श्रद्धा और गीत संगीत की वैतरणी बह रही है। चारों ओर हर्षोल्लास का वातावरण छाया हुआ है। जिसमें रमकर भक्तजन आस्था की डुबकी लगा रहे हैं। बड़ा भक्त माल आश्रम के पीठाधीश्वर श्रीमहंत अवधेश दास महाराज द्वारा कलाकारों को न्यौछावर भी भेंट किया जा रहा है। इस अवसर पर महंत अवधेश दास महाराज ने कहा कि आश्रम में युगल सरकार का झूलनोत्सव धीरे-धीरे अपने चरम पर पहुंच रहा है। मंदिर में झूलनोत्सव का कार्यक्रम श्रावण शुक्ल पूर्णिमा यानी रक्षाबंधन तक चलेगा। उसके बाद प्रतिपदा तिथि लगने के साथ ही झूलन महोत्सव का समापन हो जायेगा। युगल सरकार के झूलन की झांकी अजब है, जिसका दर्शन करने से अपार पुण्य प्राप्ति होती है। युगल सरकार के झूलनोत्सव की परंपरा अनादिकाल से चली आ रही है। भगवान श्रीराम और सीता ने सर्वप्रथम हरियाली तीज के दिन मणिपर्वत पर झूला झूला था। तब से झूलनोत्सव की परंपरा चली आ रही है, जिसका निर्वाहन हम आज भी कर रहे हैं और अपने ठाकुरजी को झूले पर पधराकर झूला झुला रहे हैं। व्यवस्था में मंदिर के युवा संत कृष्ण गोपाल दास लगे हुए हैं। इसी प्रकार रामनगरी के कनक भवन, दशरथ राज महल बड़ा स्थान, मणिराम दास छावनी, रामलला सदन देवस्थानम, हनुमान बाग, जानकी महल ट्रस्ट, कोशलेश सदन, आचार्य पीठ श्री लक्ष्मणकिला, सियाराम किला, वेद मंदिर, बावन मंदिर, जानकीघाट बड़ास्थान, श्यामा सदन, वैद्यजी मंदिर, रंगमहल आदि मंदिरों में झूलनोत्सव का उल्लास छाया है।
: शिद्दत से शिरोधार्य हुए आचार्य रामप्रसादाचार्य
Fri, Aug 1, 2025
शिद्दत से शिरोधार्य हुए आचार्य रामप्रसादाचार्यविंदु संप्रदाय के प्रथम आचार्य विंदुगाद्याचार्य बाबा रामप्रसादाचार्य महाराज की जयंती धूमधाम से मनाई गईआचार्य रामप्रसादाचार्य की गणना नगरी के शीर्ष आचार्यों एवं पहुंचे संतों में होती है, मान्यता है कि स्वामी जी को मां सीता ने साक्षात दर्शन दिया और आशीर्वाद स्वरूप अपने हाथों से स्वयं टीका लगायाहम उनकी परंपरा आगे बढ़ाते हुए स्वयं का जीवन सार्थक समझते हैं: विंदुगाद्याचार्य स्वामी देवेंद्रप्रसादाचार्यअयोध्या। सावन शुक्ल सप्तमी तिथि पर चक्रवर्ती सम्राट महाराजा दशरथ जी का राजमहल बड़ास्थान संस्थापक एवं विंदु संप्रदाय के प्रथम आचार्य विंदुगाद्याचार्य बाबा रामप्रसादाचार्य महाराज की जयंती धूमधाम से मनाई गई। जयंती महोत्सव पर गुरुवार को मठ प्रांगण में कई धार्मिक अनुष्ठान-कार्यक्रम संपन्न हुआ। सुबह सर्वप्रथम मंदिर परिसर में विराजमान स्वामी रामप्रसादाचार्य महाराज की प्रतिमा का पूजन-अर्चन, आरती किया गया। तदुपरांत अयोध्यानगरी के विशिष्ट संत-महंत, धर्माचार्यों उनके कृतित्व-व्यक्तित्व का बखान किया। उसके बाद उपस्थित संत-महंत और भक्तजनों द्वारा जयंती उत्सव पर प्रसाद ग्रहण किया गया।
करीब तीन सौ वर्ष पूर्व रहे आचार्य रामप्रसादाचार्य की गणना नगरी के शीर्ष आचार्यों एवं पहुंचे संतों में होती है। मान्यता है कि स्वामी जी को मां सीता ने साक्षात दर्शन दिया और आशीर्वाद स्वरूप अपने हाथों से स्वयं टीका लगाया। यह चमत्कार तो प्रसंगवश सामने आया। अन्यथा उनका संपूर्ण जीवन किसी चमत्कार से कम नहीं रहा। दशरथ के पुराने महल में उन्होंने धूनी रमाई वह अपनी विरासत के अनुरूप रोशन हुआ ही। उनके शिष्यों एवं अनुयायियों की भी बड़ी संख्या सामने आई। मंदिर के अनेक विशाल प्रखंड और विस्तृत भू-संपदा से यह गौरव संयोजित है। संस्कृत महाविद्यालय, संत सेवा एवं उपासना के गहन केंद्र के रूप में भी रामप्रसादाचार्य के आरम की प्रतिष्ठा शताब्दियों से कायम है। वर्तमान बिदुगाद्याचार्य स्वामी देवेंद्रप्रसादाचार्य हम उनकी परंपरा आगे बढ़ाते हुए स्वयं का जीवन सार्थक समझते हैं। उनके कृपापात्र मंगल भवन पीठाधीश्वर श्रीमद् जगद्गुरू अर्जुनद्वाराचार्य स्वामी श्री महान्त कृपालु रामभूषण देवाचार्य के अनुसार रामप्रसादाचार्य की स्मृति हमें मार्ग दिखाती है। यह भावना मंदिर में विग्रह की तरह प्रतिष्ठित आचार्य प्रतिमा से बखूबी बयां होती है।
इस अवसर पर दशरथ महल के वर्तमान विंदुगाद्याचार्य महंत देवेंद्र प्रसादाचार्य ने कहा कि बाबा स्वामी रामप्रसादाचार्य महाराज अप्रतिम प्रतिभा के धनी संत थे। जो दशरथ महल संस्थापक व प्रथम आचार्य रहे। जिन्हें गोस्वामी तुलसीदास का अवतार माना जाता है। वहीं मंगल भवन पीठाधीश्वर श्रीमद् जगद्गुरू अर्जुनद्वाराचार्य स्वामी श्री महान्त कृपालु रामभूषण देवाचार्य जी महाराज द्वारा पधारे हुए संत-महंत, धर्माचार्यों का अंगवस्त्र ओढ़ा स्वागत-सम्मान कर भेंट, विदाई दिया गया। जयंती महोत्सव पर मणिरामदास छावनी के उत्तराधिकारी महंत कमलनयन दास, महापौर गिरीशपति त्रिपाठी, लक्ष्मणकिला धीश महंत मैथिलीरमण शरण, जगतगुरु रामानंदाचार्य स्वामी रामदिनेशाचार्य, जगतगुरु रामानुजाचार्य राघवाचार्य, रंगमहल पीठाधीश्वर महंत रामशरण दास, अधिकारी राजकुमार दास, रामकथाकुंज के महंत डॉ. रामानंद दास, दिगंबर अखाड़ा के उत्तराधिकारी महंत रामलखन दास, उदासीव आश्रम के महंत डॉ. भरत दास, रसिक पीठाधीश्वर महंत जन्मेजय शरण, बड़ाभक्तमाल के महंत स्वामी अवधेश कुमार दास, बावन मंदिर के महंत वैदेहीवल्लभ शरण, महंत गौरीशंकर दास, हनुमत निवास महंत मिथिलेश नंदनी शरण, सियारामकिला के महंत करूणानिधान शरण, डाड़िया महंत गिरीश दास, सार्वभौम दार्शनिक आश्रम के महंत जनार्दन दास, श्रीरामाश्रम महंत महंत जयराम दास वेदांती, लालसाहेब दरबार के महंत रामनरेश शरण, जानकीकुंज के महंत वीरेंद्र दास, महंत अवधकिशोर शरण, महंत रामलोचन शरण, महंत सीताराम दास, महंत मनीष दास, महंत शशिकांत दास, महंत रामलखन शरण, महंत प्रियाशरण, महंत राजन बाबा, महंत रामनारायण दास, महंत राजीवलोचन शरण, महंत जनार्दन दास, महंत धर्मदास, महंत उद्धव शरण, महंत गणेशानंद दास, नागा रामलखन दास, महंत तुलसीदास, महंत कमलादास, महंत बालयोगी रामदास, महंत प्रशांत दास, भाजपा नेता अभिषेक मिश्रा, नंदकुमार मिश्र आदि संत-महंत
: श्रीरामचरितमानस के जरिए जन-जन में पहुंचे 'राम': महंत नंदराम दास
Thu, Jul 31, 2025
श्रीरामचरितमानस के जरिए जन-जन में पहुंचे 'राम': महंत नंदराम दासप्रसिद्ध पीठ श्रावण कुंज से गोस्वामी तुलसीदास जी का गहरा सरोकार रहा, अगले वर्ष जयंती और भी भव्य रुप से मनाई जायेगी साथ ही गोस्वामी तुलसीदास जी की प्रतिमा की स्थापना होगी: मामा दासअयोध्या। सावन शुक्ल सप्तमी के पर्व पर गुरुवार को मंदिर-मंदिर श्रीरामचरितमानस जैसे कालजयी ग्रंथ की रचना करने वाले गोस्वामी तुलसीदास जी का स्मरण कर संतों ने उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की। इस अवसर पर वासुदेव घाट स्थित प्रसिद्ध पीठ श्रावण कुंज मंदिर में महंत मामा दास के संयोजन में गोस्वामी तुलसीदास जी का पूजन-अर्चन के साथ सायंकाल गोष्ठी का आयोजन हुआ। इस अवसर पर गोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए निर्वाणी अनि अखाड़ा हनुमानगढ़ी के महासचिव महंत नंदराम दास जी महाराज ने गोस्वामी जी के प्रति अपनी भावसुमनाजंलि अर्पित करते हुए कहा कि श्रीरामचरितमानस के माध्यम से उन्होंने भगवान राम को जन- जन में पहुंचाने का महनीय कार्य किया। यही नहीं उन्होंने जीवन मूल्यों की भी समाज में पुनर्प्रतिष्ठा कर सम्पूर्ण विश्व को भारतीय संस्कृति से परिचित कराया। उन्होंने कहा कि गोस्वामी जी ने अपनी कृति से भारत राष्ट्र की सांस्कृक्तिक एकता को मजबूत किया और एक जन-एक राष्ट्र की अवधारणा को भी बल प्रदान किया। उनके इस सामाजिक अवदान को कभी विस्मृत नहीं किया जा सकता।
हनुमानगढ़ी से जुड़े महंत बलराम दास ने कहा कि गोस्वामी तुलसीदास जी ने श्रीरामचरितमानस को सुस्पष्ट स्वरूप दिया है कहीं कोई भ्रम या द्वंद्व नहीं रखा है। उनके मनोमष्तिष्क में कहीं भी धर्म जाति वर्ग पंक्ति भेद लेश मात्र नहीं है। इसी कारण तुलसीदास जी और उनका मानस मानव मात्र के हृदय सिंहासन पर विराजमान हो सका। कार्यक्रम के समापन पर वृहद भंडारे का आयोजन हुआ। कार्यक्रम के संयोजक महंत प्रभुदास मामा दास जी ने कहा कि गोस्वामी तुलसीदास जी ने श्रीरामचरितमानस को सुस्पष्ट स्वरूप दिया है कहीं कोई भ्रम या द्वंद्व नहीं रखा है। उनके मनोमष्तिष्क में कहीं भी धर्म जाति वर्ग पंक्ति भेद लेश मात्र नहीं है। इसी कारण तुलसीदास जी और उनका मानस मानव मात्र के हृदय सिंहासन पर विराजमान हो सका। मामा दास ने कहा कि राम की कृपा के प्रति गोस्वामी तुलसीदास जी की यह जो दीनता और शरणागति है, यही उनका चरम पुरुषार्थ है। कृपा के मूल में पुरुषार्थ नहीं होता है, अपितु पुरुषार्थ के मूल में कृपा होती है। रामचरितमानस कृपासाध्य ग्रंथ है, साधन साध्य नहीं। कर्म, उपासना, साधन, अनुष्ठानादि सब ठीक हैं, पर यह सब पाने के साधन हैं। श्रावण कुंज वही स्थान है जहां गोस्वामी तुलसीदास जी ने भगवान का बाल्यकाल गुटका की रचना की थी। इसलिए इस मंदिर से गोस्वामी तुलसीदास जी का गहरा सरोकार रहा है। अगले वर्ष ये कार्यक्रम और भी भव्य रुप से मनाया जाएगा साथ ही गोस्वामी तुलसीदास जी की प्रतिमा की स्थापना होगी। इस मौके निर्वाणी अनि अखाड़ा के महासचिव महंत नंदरामदास, महंत बलराम दास, महंत वैदेही बल्लभ शरण, उपेंद्र दास, अजीत दास, लवकुश दास, सूर्य भान दास, अभय दास,पुजारी नितिन दास,महंत रामेश्वरी शरण सहित अन्य ने भी विचार व्यक्त करते हुए भावभीनी श्रद्धांजलि दी। महंत मामा दास ने अतिथियों का स्वागत किया।