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: श्रीराम धर्म की प्रतिमूर्ति है: रत्नेशप्रपन्नाचार्य

बमबम यादव

Mon, May 23, 2022

भरत जी की तपस्थली ,नन्दीग्राम भरतकुंड पर स्वामी रत्नेशप्रपन्नाचार्य कर रहे श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण कथा की अमृत वर्षा

द्धितीय दिवस पर कथाव्यास ने कहा, जिस देश में युवा का जीवन धर्म के लिये समर्पित हो जाये वह समाज व राष्ट्र धन्य हो जाता है

अयोध्या। श्रीलक्ष्मण का चरित्र अर्पण ,समर्पण और विसर्जन का चरित्र है।उन्होंने अपने जीवन को श्रीराम की सेवा में समर्पित कर दिया है।श्रीराम धर्म की प्रतिमूर्ति है।राम धर्म के स्वरूप है।राम सनातन धर्म के प्रतीक है।राम धर्म की आत्मा है। उक्त बातें जगद्गुरू रामानुजाचार्य स्वामी रत्नेशप्रपन्नाचार्य जी महाराज ने भरत जी की तपस्थली ,नन्दीग्राम,भरतकुंड पर श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण कथा के द्धितीय दिवस में कही। स्वामी रत्नेशप्रपन्नाचार्य जी ने बताया कि लक्ष्मण का जीवन धर्म के प्रति समर्पित है।देश के हर युवा के प्रतीक है लक्ष्मण।जिस देश में युवा का जीवन धर्म के लिये समर्पित हो जाये वह समाज व राष्ट्र धन्य हो जाता है।श्रीराम राष्ट्र के मंगल के लिये यात्रा करते हैं और लक्ष्मण उनके सहयोगी है।जिस देश के युवा राष्ट्र धर्म और सेवा धर्म के समर्पित होते है वही रामराज्य की स्थापना होती है। उन्होंने कहा कि लक्ष्मण शब्द का अर्थ होता है जिसका मन लक्ष्य में लगा हो।जिस युवा का मन लक्ष्य से भटक जाता है वो कभी लक्ष्मण नहीं बन सकता।लक्ष्य विहीन युवा,समाज और राष्ट्र नष्ट हो जाता है।जीवन का जो लक्ष्य है उसके प्रति हमारा जीवन पूर्ण समर्पित होना चाहिये। जगद्गुरू रत्नेशप्रपन्नाचार्य जी ने कहा कि धैर्य और संयम सफलता की कुंजी है। जब मन इन्द्रियों के वशीभूत होता है, तब संयम की लक्ष्मण रेखा लाँघे जाने का खतरा बन जाता है, भावनाएँ अनियंत्रित हो जाती हैं। असंयम से मानसिक संतुलन बिगड़ जाता है इंसान असंवेदनशील हो जाता है मर्यादाएँ भंग हो जाती हैं। इन सबके लिए मनुष्य की भोगी वृत्ति जिम्मेदार है। काम, क्रोध, लोभ, ईर्ष्या असंयम के जनक हैं व संयम के परम शत्रु हैं। इसी तरह नकारात्मक आग में घी का काम करती है। वास्तव में सारे गुणों की डोर संयम से बँधी हुई होती है। जब यह डोर टूटती है तो सारे गुण पतंग की भाँति हिचकोले खाते हुए व्यक्तित्व से गुम होते प्रतीत होते हैं। उन्होंने कहा कि मात्र कुछ क्षणों के लिए असंयमित मन कभी भी ऐसे दुष्कर्म को अंजाम देता है कि पूर्व में किए सारे सत्कर्म उसकी बलि चढ़ जाते हैं। असंयम अनैतिकता का पाठ पढ़ाता है। अपराध की ओर बढ़ते कदम असंयम का ही परिणाम हैं। इन्द्रियों को वश में रखना, भावनाओं पर नियंत्रण रखना संयम को परिभाषित करता है। मानव को मानव बनाए रखने में यह मुख्य भूमिका निभाता है।विवेक, सहनशीलता, सद्विचार, संवेदनशीलता, अनुशासन तथा संतोष संयम के आधार स्तंभ हैं। धैर्य और संयम सफलता की पहली सीढ़ी हैं। जगद्गुरु जी ने कहा कि अच्छे संस्कार, शिक्षा, सत्संग आदि से विवेक को बल मिलता है। मेहनत, सेवाभाव, सादगी से सहनशीलता बढ़ती है। चिंतन, मंथन आदि से विचारों का शुद्धिकरण होता है। इस प्रकार प्रभु की प्रार्थना, भक्ति से मनुष्य संवेदनशील हो जाता है। अतः दृढ़ निश्चय से ही मानव जीवन अनुशासित होता है। रामकथा में मणिराम दास छावनी के उत्तराधिकारी महंत कमलनयन दास,संत परमात्मा दास सहित बड़ी संख्या में कथा प्रेमी मौजूद रहें।

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