: विशुद्ध चित्त ही वसुदेव है और देवकी निष्काम भक्ति: जगद्गुरु
बमबम यादव
Mon, Nov 21, 2022
गहोई मंदिर में व्यासपीठ से श्रीमद् भागवत कथा की अमृत वर्षा कर रहे जगद्गुरू रामानन्दाचार्य स्वामी रामदिनेशाचार्य
अयोध्या। आध्यात्मिक योग मोक्ष का साधन है। मन ही हमारे बंधन और मोक्ष का कारण है। जब संत पुरुषों का संग होता है तो मन सतोगुण संयुक्त होकर भगवत चिंतन करता है जो ही मुक्तिका कारण भी बन जाता है।
उक्ताशय के उद्गार रामनगरी के गहोई मंदिर में आयोजित श्रीमद् भागवत महोत्सव के तृतीय दिवस जगद्गुरू रामानन्दाचार्य स्वामी रामदिनेशाचार्य जी ने भागवत कथा में कपिल भगवान व माता देवहूति प्रसंग का वर्णन करते हुए व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि जब कर्म अथवा यज्ञ का उद्देश्य परमेश्वर के लिए होता है तो वह सफल होता है। कर्मों के उपभोक्ता तो वास्तव में ईश्वर ही है वही हमें कर्म फल प्रदान करते हैं। मनुष्य को अपने माता पिता, गुरु व अपने श्रेष्ठ का अपमान नहीं करना चाहिए। गुरु ज्ञान का दाता है, जो जीवन को परम लक्ष्य परमात्मा से मिलाता है। जगद्गुरू जी ने कहा कि मनुष्य का जीवन अद्भुत है। एक बार ही मिलता है। मनुष्य ने जीवन को रसिकता के साथ जीना चाहिए। जीवन के प्रत्येक क्षण को अमूल्य मानकर उसका महत्तम आनंद उठाना, जीवन को सार्थक बनाता है। आनंद ईश्वरस्वरुप होता है। इसलिए दुखों को ज्यादा देर अपने मन में संजोये नहीं रखना चाहिए। यह महोत्सव गहोई मंदिर के महंत रामलखन शरण जी महाराज के पावन सानिध्य में हो रहा है।
श्रीमद्भागवत कथा महोत्सव में श्रीकृष्ण नंद महोत्सव प्रसंग पर जगद्गुरू रामानन्दाचार्य स्वामी रामदिनेशाचार्य जी महाराज ने कहा कि विशुद्ध चित्त ही वसुदेव है और देवकी निष्काम भक्ति। इन दोनों के मिलन होने पर भगवान कृष्ण का जन्म होता है। जब बुद्धि ईश्वर का अनुभव करती है, तब संसार के सारे विषय बंधन टूट जाते है। जो भगवान को अपने मष्तक पर विराजमान करता है, उसके लिए मोक्ष के द्वार खुल जाते है। कथा के शुभांरभ पर व्यासपीठ का पूजन यजमान रामअवतार सीपोला आशीष शुक्ला ने व्यासपीठ का पूजन किया। इस मौके पर गौरव दास, शिवेन्द्र दास सहित बड़ी संख्या में कथा प्रेमी मौजूद रहें।
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