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: राम देश की एकता के प्रतीक हैं: राघवाचार्य

बमबम यादव

Thu, Aug 18, 2022

कहा, जीवन की धन्यता भौतिक पदार्थों के संग्रहण में नहीं अपितु सुविचारों एवं सद्गुणों के संचयन में निहित 

अयोध्या। श्रीरामलला सदन देवस्थान ट्रस्ट रामकोट अयोध्या में चल रही श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण कथा के पंचम दिवस जगद्गुरु रामानुजाचार्य स्वामी डा राघवाचार्य जी महाराज ने कहा कि राम तो प्रत्येक प्राणी में रमा हुआ है, राम चेतना और सजीवता का प्रमाण है। भारतीय समाज में मर्यादा, आदर्श, विनय, विवेक, लोकतांत्रिक मूल्यों और संयम का नाम राम है। असीम ताकत अहंकार को जन्म देती है। लेकिन अपार शक्ति के बावजूद राम संयमित हैं।

वे सामाजिक हैं, लोकतांत्रिक हैं। वे मानवीय करुणा जानते हैं। वे मानते हैं पर हित सरिस धरम नहीं भाई। राम देश की एकता के प्रतीक हैं। जगद्गुरू जी ने कहा कि मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम समसामयिक है।भारतीय जनमानस के रोम-रोम में बसे श्रीराम की महिमा अपरंपार है। जीवन की धन्यता भौतिक पदार्थों के संग्रहण में नहीं अपितु सुविचारों एवं सद्गुणों के संचयन में निहित है। जिसके पास जितने श्रेष्ठ एवं पारमार्थिक विचार हैं वह उतना ही सम्पन्न प्राणी है। आज समाज में अशांति कोई पशु या जानवर नहीं फैला रहा, बल्कि अपने स्वरूप से अनभिज्ञ भौतिक पदार्थ की दौड़ में लगा मनुष्य ही फैला रहा है। दूसरों को शांत करने से पहले खुद शांत होना होगा। शांति व आनंद का स्रोत केवल ईश्वर है जो भक्ति द्वारा प्राप्त किया जा सकता है।

मनुष्य के अन्तःकरण में जो गुणों के बीज हैं, वे सत्संग और कुसंग के कारण अंकुरित होते हैं। अगर कुसंग के जल की वर्षा हो जाय तो अन्तःकरण में छिपे हुए दुर्गुण सामने आ जाते हैं। रामानुजाचार्य जी ने कहा कि व्यक्ति को कुसंग से बचना चाहिए, इसका तात्पर्य यह है कि अगर वर्षा ही नहीं होगी तो अंकुर भीतर से कैसे फूटेगा। अतएव यदि हम उन सहयोगियों के, जो हमारे दुर्गुणों को, हमारी दुर्बलताओं को बढ़ा दिया करते हैं, सन्निकट नहीं जावेंगे तो भले ही हमारे जीवन में दुर्गुणों के संस्कार विद्यमान हों, वे उभर नहीं पावेंगे। मानवीय जीवन के सद्गुणों के अंकुरित होने के लिए जिस जल की अपेक्षा है, वह है सत्संग का जल। कथा से पूर्व व्यासपीठ का पूजन यजमान ने किया।इस मौके पर विनोद कुमार मिश्र, मनोज कुमार तिवारी,राघवेंद्र मिश्र अप्पू, दया शंकर शुक्ल, रमेश मिश्र शिब्बू सहित बड़ी संख्या में संत साधक मौजूद रहें।

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