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: कलात्मक स्वतंत्रता की आड़ में पौराणिक आख्यानों का अपमान

बमबम यादव

Sun, Oct 9, 2022

प्रभु श्रीराम के चरित्र में न तो आक्रामकता थी, न ही रावण के चरित्र में कमीनापन

अनंत विजय। फिल्म आदिपुरुष के अंश में रावण को देखकर कुछ लोग ये कह रहे हैं कि ये रावण कम खिलजी ज्यादा लग रहा है। खितुलसीदास, वाल्लमीकिजी लगे या कोई और लेकिन रावण की लोक में प्रचलित छवि से बिल्कुल अलग है। रावण के गुणों के बारे में वाल्मीकि और तुलसीदास दोनों ने विस्तार से लिखा है। लंकेश इतना बड़ा और पराक्रमी राजा था कि उसने तीनों लोक को जीता था। वो बहुत बड़ा शिव भक्त था, तपस्वी था लेकिन अहंकारी था। फिल्म आदिपुरुष में जो रावण बनाया गया है वो अहंकारी तो बिल्कुल नहीं दिखता है, हां उसके चेहरे पर, उसकी संवाद अदायगी या हावभाव में कमीनापन अवश्य दिखता है। रावण अहंकारी अवश्य था लेकिन उसके कमीनेपन का चित्रण न तो वाल्मीकि ने किया है और न ही तुलसीदास ने। आदिपुरुष फिल्म के निर्देशक ने किस तरह से रावण के चरित्र को गढ़ा है, उनका सोच क्या था ये तो वही बता सकते हैं। लोक में व्याप्त लंकेश की छवि को इस तरह से भ्रष्ट करना और फिर उसका हास्यास्पद तरीके से बचाव करके फिल्म से जुड़े लोग अपनी अक्षमता को ढंकने का प्रयास कर रहे हैं। प्रभु श्रीराम और रामकथा के पात्रों को लेकर वाल्मीकि का जो सोच था या जो तुलसी की अवधारणा थी उसका शतांश भी इस फिल्म में नहीं दिखाई दे रहा है। फिल्म में हनुमान की वेशभूषा  को भी आधुनिक बनाने के चक्कर में निर्माता- निर्देशक ने क्या गड़बड़ियां की हैं ये फिल्म प्रदर्शित होने के बाद पता चलेगी। फिलहाल तो जो कुछ दृश्य है जिसको लेकर अनुमान लगाया जा सकता है कि वहां भी गड़बड़ी हुई है।     

कलात्मक अभिव्यक्ति के नाम पर पौराणिक आख्यानों के चरित्रों को इस तरह से प्रदर्शित कर अपमानित करने की छूट नहीं दी जा सकती है। लोक में व्याप्त छवि से छेड़छाड़ करके फिल्में सफल नहीं हो सकती हैं। कुछ दिनों पूर्व प्रदर्शित फिल्म सम्राट पृथ्वीराज में भी लोक में प्रचलित छवि से अलग दिखाया गया। परिणाम सबके सामने है। अगर उस फिल्म में चंद्रप्रकाश द्विवेदी ने लोक में व्याप्त कथाओं के आधार पर पृथ्वीराज का चरित्र गढ़ा होता तो सफल हो सकते थे। चंद्रप्रकाश द्विवेदी ने तो पृथ्वीराज रासो पर खुद को केंद्रित रखा लेकिन आदिपुरुष के लेखक और निर्देशक न तो वाल्मीकि के करीब जा सके और न ही तुलसी के। संभव है कि उन्होंने अंग्रेजी की कोई फिल्म देखी होगी और उनको लगा होगा कि तकनीक का प्रक्षेपण करके हिंदी में भी इस तरह की फिल्म बनाई जाए। इन दिनों हिंदू पौराणिक आख्यानों पर आधारित फिल्में दर्शकों को पसंद आ रही है। निर्माताओं ने सोचा होगा कि रामकथा को तकनीक के सहारे कहा जाए तो सफलता के सारे कीर्तिमान ध्वस्त किए जा सकते हैं। इस फिल्म से जुड़े लोग ये भूल गए कि राम का जो उद्दात चरित्र भारतीय जनमानस पर अंकित है उसके विपरीत जाने से अपेक्षित परिणाम नहीं मिलेगा। अगर गंभीरता से फिल्मकार काम करना चाहते थे तो उनको गीताप्रेस गोरखपुर स्थित लीला चित्र मंदिर जाकर वहां लगी तस्वीरों को देखना चाहिए था, इससे उनकी फिल्म के पात्रों को प्रामाणिकता मिलती और लोक को संतोष और उनको सफलता।    

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