Wednesday 4th of November 2026

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नवनिर्मित देवस्थान श्रीरामायणवेला में प्राणप्रतिष्ठा महोत्सव का छाया : वाल्मीकि रामायण कथा बह रही रसधार, व्यासपीठ से कथा कहा रहें जगद्गुरु रत्नेशप्रपन्नाचार्य 

नवनिर्मित देवस्थान श्रीरामायणवेला में प्राणप्रतिष्ठा महोत्सव का छाया उल्लास

वाल्मीकि रामायण कथा बह रही रसधार, व्यासपीठ से कथा कहा रहें जगद्गुरु रत्नेशप्रपन्नाचार्य 

अयोध्या । नवनिर्मित देवस्थान श्रीरामायणवेला में प्राणप्रतिष्ठा महोत्सव के उपलक्ष्य में आयोजित वाल्मीकि रामायण कथा के दौरान जगद्गुरु रत्नेशप्रपन्नाचार्य ने कहा कि अयोध्या की पावन भूमि पर भगवान का मानव रूप में अवतरण केवल एक जन्म नहीं, बल्कि धर्म, मर्यादा और प्रेम का पुनः अवतरण था। उन्होंने कहा कि वाल्मीकि रामायण में वर्णित प्रसंग आज भी जनमानस के हृदय को आलोकित करते हैं।उन्होंने कहा कि ‘अवतार’ शब्द जितना सरल प्रतीत होता है, उतना ही गूढ़ है। जब धर्म की धारा क्षीण होती है, तब ईश्वर स्वयं साकार रूप में अवतरित होकर आचरण के माध्यम से धर्म की पुनर्स्थापना करते हैं। अनंत, स्वयं को सीमित कर मानव रूप में समाज के बीच चलता है और जीवन मूल्यों की स्थापना करता है।

    कथा के दौरान उन्होंने भगवान राम के प्राकट्य प्रसंग का उल्लेख करते हुए कहा कि कौशल्या नंदन के जन्म के साथ ही करुणा का सागर उमड़ पड़ा। दिशाएं मंगलमय हो उठीं और जन-जन के अंतःकरण में शांति का संचार हुआ। बालक राम की प्रथम किलकारी वेदों की नवध्वनि के समान थी।जगद्गुरु ने कहा कि बाल्यकाल से ही राम की सरलता और मर्यादा अद्वितीय थी। भ्राताओं के साथ क्रीड़ा करते समय भी उनके आचरण में स्नेह और समता का भाव स्पष्ट झलकता था। गुरु वशिष्ठ के आश्रम में उनकी विनम्र उपस्थिति यह संदेश देती है कि ईश्वर भी जब मानव रूप में आते हैं तो अनुशासन और ज्ञान के पथ का अनुसरण कर समाज को आदर्श प्रदान करते हैं।उन्होंने कहा कि राम की बाल लीलाएं केवल भाव-विभोर करने वाली कथा नहीं, बल्कि जीवन संस्कारों का प्रथम अध्याय हैं। महानता का मूल विनय, सामर्थ्य का सार संयम और ईश्वरत्व की पहचान सरलता है। कथा के समापन पर श्रद्धालुओं ने भावविभोर होकर जयघोष किया और धर्म, मर्यादा व करुणा के मार्ग पर चलने का संकल्प लिया।

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