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: हरिशंकर तिवारी - "साइकिल" से "साइकिल" तक :-

बमबम यादव

Mon, Dec 13, 2021

हरिशंकर तिवारी परिवार (बेटे भीष्म शंकर तिवारी, विनय तिवारी और भांजे गणेश शंकर पांडेय) का सपा के आना सपा के लिए ब्राह्मण वर्ग को अपने पक्ष ने करने की संजीवनी हो सकती है, लेकिन वर्तमान में यूपी की सत्ता पर "ठाकुर" काबिज होना पिछले 5 दशकों में हरिशंकर तिवारी और वीरेंद्र प्रताप शाही द्वारा ठाकुर - ब्राह्मण रार को जिंदा कर देता है।

वीरेंद्र प्रताप शाही को जहां एक ओर 1979 में विधायक रविंद्र सिंह की हत्या के बाद पूर्वांचल के पहला "शेर ए पूर्वांचल" कहा गया वहीं दूसरी ओर हरिशंकर तिवारी जेल से राजनीति में बाहुबल की इंट्री करवाने वाले प्रथम व्यक्ति बने कहा तो यह भी जाता है की वीर बहादुर सिंह की सरकार में गुंडा और गैंगस्टर एक्ट जैसे कानून भी हरिशंकर तिवारी के लिए ही लाए गए थे।

बहरहाल एक समय ऐसा भी आता है जब श्री प्रकाश लखनऊ में सरे आम वीरेंद्र शाही की हत्या कर देता है, सारा आरोप हरिशंकर पर लगता है, क्योंकि हरिशंकर पर पहले भी श्री प्रकाश को संरक्षण देने का आरोप लगता रहा है, जबकि कहानी बिल्कुल इसके उल्ट थी, श्री प्रकाश को हरिशंकर तिवारी का राजनीतिक संरक्षण तब तक ही प्राप्त था जा तक श्री प्रकाश की महत्वकांक्षा तिवारी परिवार के चरणों में पड़ी रही, बाद में तो चिल्लूपार विधानसभा को लेकर श्री प्रकाश और हरिशंकर ही आमने सामने थे, कल्याण सिंह सरकार में जब हरिशंकर मंत्री मंडल में थे तो वो हो एकमात्र ऐसे ब्राह्मण नेता रहे हैं जिनसे श्री प्रकाश को तनातनी रही है, कहते हैं वीरेंद्र सिंह शाही की हत्या के बाद उसकी हिटलिस्ट में दूसरा नाम हरिशंकर का ही था, तथा तीसरे नंबर पर तत्कालीन मुख्यमंत्री कल्याण सिंह का, जिन्हे श्री प्रकाश शुक्ल अपना निजी दुश्मन मानता था, बहरहाल ये वो लिस्ट है जिसे श्री प्रकाश ने खुद कभी सत्यापित नहीं किया, बस ये एक ऐसी अदृश्य लिस्ट है जो किस्से कहानी लिखने में ही काम आती है।
कल्याण सिंह का नाम आने से श्री प्रकाश का क्या हाल हुआ…? वो उनका निजी दुश्मन था या नहीं, या सारा गेम प्लान हरिशंकर तिवारी का था ये सब एक अलग विषय है, लेकिन श्री प्रकाश एनकाउंटर के बाद चिल्लूपार तिवारी परिवार की पारंपरिक सीट हो गई।

कम लोगों को मालूम होगा कि 1985 में जब हरिशंकर तिवारी निर्दलीय चुनाव लडे थे उस समय उनका चुनाव चिन्ह "साइकिल" ही था, ये अलग बात की सपा का गठन होने के बाद यह निशान सपा का आधिकारिक निशान हो गया, लेकिन अब चूंकि उनका पूरा परिवार सपा में है तो आप कह सकते हैं की तिवारी परिवार साइकिल से चलकर साइकिल तक ही पहुंच गया।
अब सपा पर निर्भर करता है कि पूर्वांचल में ब्राह्मणों के सबसे मजबूत नेतृत्व को किस तरह कैश करती है लेकिन इतना तो तय है की तिवारी परिवार का सपा ने आना ठाकुर - ब्राह्मण रार को पुनर्जीवित कर देगा।

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