: दिग्गज आचार्यों से आलोकित है रामनगरी
Sat, Apr 23, 2022
सियाराम किला झुनकी घाट के प्रथम व द्धितीय आचार्य की पुण्यतिथि रविवार को
सियाराम किला पीठाधीश्वर श्रीमहंत करुणानिधान शरण
पूर्वाचार्यों की इस परम्परा को प्राणपण से आगे बढ़ाकर गौरवान्वित है: महंत करुणानिधान शरण
अयोध्या। मां सरयू के पावन तट पर सुशोभित प्रतिष्ठित पीठ सियाराम किला झुनकी घाट के प्रथम आचार्य महंत मिथिलाशरण जी महाराज की 32वीं व द्धितीय आचार्य महंत किशोरीशरण जी महाराज की 23वीं पुण्यतिथि रविवार को श्रद्धापूर्वक मनाई जाएगी। इन दिग्गज आचार्यों से मात्र सियाराम किला ही नही सम्पूर्ण रामनगरी आलोकित है।
रामनगरी में साधना एवं सिद्धि के पर्याय स्वामी जानकीशरण जी महाराज झुनकी बाबा के शिष्य मिथिलाशरण जी को गुरच परम्परा के प्रति समर्पित पहुंचे हुए साधक यशश्वी महंत के रुप में याद किया जाता है। उनका जन्म बिहार प्रांत के नवादा जिला के बुधवारा के जमींदार घराने में हुआ था। तब वे किशोरवय के ही थे, जब झुनकी बाबा के सम्पर्क में आयें और उन्हीं के होकर रह गए। यहां तक की उन्होंने गुरु के नाम से स्थापित आश्रम एवं सरयू का घाट बनाने के लिए अपनी जन्मभूमि की पूरी संपदा अर्पित करने में भी संकोच नही किया।
1976 में उन्हीं के संयोजन में सरयू की रेत में हुए यज्ञ की भव्यता अभी भी लोगों के जेहन में जिंदा है। इस यज्ञ में हनुमानगढ़ी के महंत को हाथी दान में दिया गया था। सियाराम किला के रुप में एक धार्मिक संस्था को भव्यता देने वाले पूज्य मिथिलाशरण जी को जब लगा कि उनका शरीर थक रहा है, तो उन्होंने महंती छोड़ने में एक पल की भी देरी नही की और अंतिम श्वांस लेने के 6 वर्ष पूर्व ही उन्होंने महंती अपने शिष्य किशोरीशरण जी को प्रदान की। यह निर्णय सियाराम किला की गौरवपूर्ण परम्परा में चार चांद लगाने वाला रहा। गुरु भक्त के रुप में पूज्य किशोरीशरण जी आज भी स्मरणीय है, तो स्थान की मर्यादा के अनुरुप साधु सेवी के रुप में उनका कोई सानी नहीं है।
महंत किशोरीशरण जी महाराज के शिष्य एवं उत्ताराधिकारी वर्तमान महंत करुणानिधान शरण जी महाराज के अनुसार पूर्वाचार्यों ने सियाराम किला को परिपूर्ण धार्मिक केंद्र के तौर पर स्थापित करने में कोई कसर नही छोडी पर उनका प्रताप था वे मठ मंदिर के बजाय प्रभु भक्ति एवं चरित्र निर्माण के पक्षधर थे, आज हम पूर्वाचार्यों की इस परम्परा को प्राणपण से आगे बढ़ाकर गौरवान्वित है।
: श्रद्धा और उल्लास से मना गुरु तेग बहादुर जी का 400वां प्रकाशाेत्सव
Fri, Apr 22, 2022
धर्म, न्याय, अध्यात्म, शूरवीर, विद्वता, दानवीरता एवं वैभव की पराकाष्ठा के प्रतिमूर्ति गुरु तेग बहादुर : बाबा महेंद्र सिंह
धर्म की रक्षा के लिए गुरु जी ने दी शहादत, गुरु तेगबहादुर का जीवन काफी वीरतापूर्ण था: सेवादार सरदार नवनीत
अयोध्या। रामनगरी के नजरबाग स्थित ऐतिहासिक गुरूनानक गाेविंदधाम गुरूद्वारा में गुरु तेग बहादुर जी का 400 वां प्रकाशाेत्सव श्रद्धा और उल्लास से मनाया गया। गुरूवार सुबह गुरू ग्रंथ साहिब के सम्पूर्ण पाठ की समाप्ति। पाठ समाप्ति उपरांत भजन-कीर्तन एवं उसके बाद लंगर प्रसाद का आयाेजन किया गया, जिसमें श्रद्धालुओं ने लंगर छका।
गुरु तेग बहादुर जी का 400वां प्रकाश पर्व 21 अप्रैल को यानी आज मनाया जा रहा है। गुरु तेग बहादुर गुरु नानक के सिद्धांतों का प्रचार करने के लिए जाने जाते है। गुरु तेग बहादुर प्रकाश पर्व उनके जीवन और शिक्षाओं को याद करने के लिए मनाया जाता है। गुरु साहिब एक बेहतरीन कवि और विद्वान थे, जिन्होंने सिख धर्म की पवित्र पुस्तक श्री गुरु ग्रंथ साहिब में बहुत योगदान दिया था।
मुगल शासन के समय में हिंदुओं का काफी उत्पीड़न होता था। मुगल सम्राट औरंगजेब के शासनकाल में लोगों को इस्लाम में परिवर्तित होने के लिए मजबूर किया गया था। उस समय उन्होंने गैर-मुसलमानों के इस्लाम में जबरन धर्मांतरण का विरोध किया था। इसके बाद 1675 में दिल्ली में गुरु तेग बहादुर का इस्लाम को अपनाने से इनकार करने के लिए मुगल सम्राट औरंगजेब के आदेश पर सिर काटकर उनकी हत्या कर दी गई थी। जहां गुरु तेग बहादुर जी ने अपने प्राणों की आहुति दी थी, उस जगह गुरुद्वारा शीशगंज साहिब बनाया गया। ये गुरुद्वारा दिल्ली के सबसे प्रसिद्ध इलाके चांदनी चौक में स्थित है। देश भर में आज सिखों के नौवें गुरु श्री गुरु तेग बहादुर जी का 400वां प्रकाश पर्व मनाया जा रहा है। गुरु तेग बहादुर सिंह एक क्रांतिकारी युग पुरुष थे और उनका जन्म वैसाख कृष्ण पंचमी को पंजाब के अमृतसर में हुआ था। इस दिन को शहीदी दिवस के रूप में मनाया जाता है। इस दिन गुरु साहिब के इतिहास और शहादत के बारे में बताया जाता है।
गुरूनानक गाेविंदधाम गुरूद्वारा के जत्थेदार बाबा महेंद्र सिंह ने कहा कि गुरू गाेविंद सिंह महाराज सिक्ख धर्म के नौवें गुरू थे। जिनका प्रकाश पर्व हम लाेगाें ने हर्षाेल्लास पूर्वक मनाया। यह उनका 400वां प्रकाशाेत्सव था। जन्माेत्सव पर गुरूद्वारा में धार्मिक कार्यक्रम सम्पन्न हुए।जत्थेदार बाबा महेंद्र सिंह ने कहा कि अमृतसर में जन्मे गुरु तेग बहादुर गुरु हरगोविन्द जी के पांचवें पुत्र थे। 8वें गुरु हरिकृष्ण राय जी के निधन के बाद इन्हें 9वां गुरु बनाया गया था। इन्होंने आनन्दपुर साहिब का निर्माण कराया और ये वहीं रहने लगे थे। वे बचपन से ही बहादुर, निर्भीक स्वभाव के और आध्यात्मिक रुचि वाले थे। मात्र 14 वर्ष की आयु में अपने पिता के साथ मुगलों के हमले के खिलाफ हुए युद्ध में उन्होंने अपनी वीरता का परिचय दिया। इस वीरता से प्रभावित होकर उनके पिता ने उनका नाम तेग बहादुर यानी तलवार के धनी रख दिया। बाबा जी ने गुरु तेगबहादुर जी के बारें में बताते हुए कहते है कि गुरु जी मुगल शासक औरंगजेब की तमाम कोशिशों के बावजूद इस्लाम धारण नहीं किया और तमाम जुल्मों का पूरी दृढ़ता से सामना किया। औरंगजेब ने उन्हें इस्लाम कबूल करने को कहा तो गुरु साहब ने कहा शीश कटा सकते हैं केश नहीं। औरंगजेब ने गुरुजी पर अनेक अत्याचार किए, परंतु वे अविचलित रहे। वह लगातार हिन्दुओं, सिखों, कश्मीरी पंडितों और गैर मुस्लिमों का इस्लाम में जबरन धर्मांतरण का विरोध रहे थे जिससे औरंगजेब खासा नाराज था। आठ दिनों की यातना के बाद गुरुजी को दिल्ली के चांदनी चौक में शीश काटकर शहीद कर दिया गया। उनके शहीदी स्थल पर गुरुद्वारा बनाया गया जिसे गुरुद्वारा शीशगंज साहब नाम से जाना जाता है। इसी के साथ विश्व इतिहास में धर्म एवं मानवीय मूल्यों, आदर्शों एवं सिद्धांत की रक्षा के लिए प्राणों की आहुति देने वालों में गुरु तेग बहादुर साहब का स्थान अद्वितीय है। कहा जाता है गुरु तेग बहादुर सिंह सिक्खों के नौंवें गुरु थे। इसी के साथ बहादुर जी के बचपन का नाम त्यागमल था और उनके पिता का नाम गुरु हरगोबिंद सिंह था।जत्थेदार बाबा ने कहा कि जिनके दिन मनाते हाे उनकी बात भी जानाे। जिनके दिन मनाते हाे उनकी बात भी मानाे। अर्थात गुरू पर्व मनाना तभी सफल है। जब हम उनके जीवन से प्रेरणा लें।
गुरूद्वारा के सेवादार सरदार नवनीत सिंह ने कहा कि गुरु तेग बहादुर अपने त्याग और बलिदान के लिए वह सही अर्थों में हिन्द की चादर कहलाए। अपने धर्म, मानवीय मूल्यों, आदर्शों एवं सिद्धांत की रक्षा के लिए विश्व इतिहास में जिन लोगों ने प्राणों की आहुति दी, उनमें गुरु तेग बहादुर साहब का स्थान अग्रिम पंक्ति में हैं।अंत में उन्होंने सभी संगत व प्रबंधक कमेटियाें का आभार ज्ञापित किया। गुरूद्वारा के सेवादार सरदार नवनीत सिंह द्वारा प्रकाशाेत्सव पर आए हुए विशिष्टजनाें का स्वागत-सत्कार किया गया।
: हिंदू राष्ट्र को लेकर संताें ने जगद्गुरू परमहंसाचार्य का किया सम्मान
Wed, Apr 20, 2022
वृंदावन धाम के आचार्य महामंडलेश्वर श्रीमहंत धर्मेंद्र गिरि व महाराष्ट्र से महामंडलेश्वर श्रीमहंत एकनाथ गिरि तपस्वी छावनी पर जगद्गुरू को किया सम्मानित
अयाेध्या। हिंदू राष्ट्र की मुहिम चलाने वाले तपस्वी छावनी पीठाधीश्वर जगद्गुरू परमहंस आचार्य का संताें ने सम्मान किया। बुधवार काे वृंदावन धाम के आचार्य महामंडलेश्वर श्रीमहंत धर्मेंद्र गिरि और महाराष्ट्र से महामंडलेश्वर श्रीमहंत एकनाथ गिरि अयाेध्या पहुंचे। जहां उन्होंने तपस्वी छावनी जाकर परमहंस आचार्य काे सम्मानित किया।
इस अवसर पर जगद्गुरू परमहंस आचार्य ने कहा कि देश काे हिंदू राष्ट्र घाेषित कराने के लिए सर्वप्रथम मैंने आवाज उठायी। साथ ही 16 दिनाें तक आमरण-अनशन भी किया। आज हिंदू राष्ट्र की मांग देश के हर काेने में उठ रही है। इसके लिए साधु-संत व हिंदू जनमानस मुहिम चला रहा है। हिंदू राष्ट्र घाेषित कराने के लिए एक दिन हम साै कराेड़ मिलकर सड़काें पर उतरेंगे। केंद्र सरकार भारत काे हिंदू राष्ट्र घाेषित करेगी। देश 2024 तक हिंदू राष्ट्र घाेषित हाे। इसके लिए 29 प्रदेशाें में हम लाेग अभियान चला रहे हैं। उन्होंने कहा कि जिस दिन भारत हिंदू राष्ट्र घाेषित हाे जायेगा। उस दिन देश विरोधी ताकतें अपने आप छंट जायेंगी। इसके बाद रामराज्य का अभ्युदय हाे जायेगा।
वहीं श्रीमठ महेश्वर धाम वृंदावन के आचार्य महामंडलेश्वर श्रीमहंत धर्मेंद्र गिरि ने कहा कि हिंदू राष्ट्र के समर्थन में हम लोग महाराज श्री के साथ जुड़े हुए हैं। उनकी प्रेरणा से महेश्वर धाम वृंदावन में अखंड धूनी के सामने 11 मार्च 2022 से श्रीराम महायज्ञ शुरू हुआ है, जिसका शुभारंभ स्वयं जगद्गुरू परमहंस आचार्य ने किया है। श्रीराम महायज्ञ में 1008 ब्राह्मण प्रतिदिन नियमित आहुति डाल रहे हैं। यह महायज्ञ भारत के हिंदू राष्ट्र घाेषित हाेने तक जारी रहेगा।
महामंडलेश्वर श्रीमहंत एकनाथ गिरि महाराष्ट्र ने कहा कि हम साधु-संत व हिंदू जनमानस जगद्गुरू परमहंस आचार्य के समर्थन में हैं। उनकी हिंदू राष्ट्र की मांग जायज है। भारत जल्द से जल्द हिंदू राष्ट्र घाेषित हाेना चाहिए। यह मांग हमारी माेदी सरकार से है।