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: अहिंसा परमो धर्मा को चरितार्थ कर रहा जैन धर्म 

बमबम यादव

Wed, Mar 15, 2023

सभी के प्रति होनी चाहिए दया, ममता और प्यार की भावना: ज्ञानमती माता

भगवान ऋषभदेव की 31 फिट ऊंची प्रतिमा का महा मस्तिकाभिषेक आज

जैन मंदिर रायगंज से निकलेगी शोभायात्रा, यात्रा में जैन संस्कृति पर आधारित आकर्षक झांकियों होगी आकर्षण का केंद्र

अयोध्या। धर्मनगरी अयोध्या भूमि ऐसी है, जहां पर सभी धर्मों के बहुरंगी फूल खिले। हिंदू, जैन, बौद्ध, सिख, इस्लाम सब के सब इसके आंगन में पले-बसे और बड़े हुए। यह ऐसी पवित्र भूमि है जिसने सबको रिझाया। अयोध्या में जैन धर्म की भी जड़ें गहरी हैं।

जैन धर्म के कुल 24 तीर्थंकर हुए, जिनमें से पांच तीर्थंकरों की जन्मभूमि अयोध्या ही है। जैनधर्म के प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव के जन्म से पावन एवं पवित्र है, अयोध्या नगरी प्रत्येक काल में तीर्थंकरों के जन्म अयोध्या नगरी में होते रहे हैं, इसी क्रम में भगवान के जन्म पन्द्रह महीने पूर्व तक इन्द्रों के द्वारा प्रत्येक दिन करोड़ों रत्न बरसाएँ जाते हैं, वर्तमान में भगवान ऋषभदेव, श्री अजितनाथ जी, श्री अभिनन्दननाथ जी, श्री सुमतिनाथजी एवं श्री अनन्तनाथजी का जन्म इसी रत्नगर्भा भूमि पर हुआ है। वर्तमान में रायगंज (अयोध्या) स्थित दिगम्बर जैन मन्दिर में जैनधर्म के प्रथम तीर्थंकर भगवान श्री ऋषभदेव की 31 फुट उत्तुंग श्वेत वर्ण की प्रतिमा विशाल जिनमन्दिर में विराजमान हैं। जहाँ प्रतिदिन अनेक श्रद्धालु भक्त आकर के पूजा प्रक्षाल एवं धार्मिक क्रिया किया करते हैं।

जैन समाज की सर्वोच्च साध्वी गणिनी प्रमुख ज्ञानमती माताजी और रविंद्र कीर्ति स्वामी जी के पावन सानिध्य में महा मस्तिकाभिषेक महोत्सव मनाया जा रहा है।

सर्वोच्च साध्वी गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी ने कहती है कि अहिंसा परम धर्मा जीवन का मूल मंत्र है। सभी के प्रति दया, ममता और प्यार की भावना होनी चाहिए। अहिंसा के मार्ग पर चलने से ही खुशियां और प्रभु कृपा मिलेगी।

जैन मुनि व हस्तिापुर पीठाधीश्वर रवींद्र जी कहते हैं कि अयोध्या में जैन धर्म की परंपराएं और जड़ें बहुत ही गहरी एवं पुरातन है। पांच तीर्थंकर इच्छवाकु वंशी इसी धरती पर हुए थे। यहीं से उन लोगों ने पूरे विश्व को मानवता व शिक्षा का संदेश दिया।

प्रतिष्ठाचार्य विजय कुमार ने बताया कि पाँचों तीर्थंकरों की जन्मभूमि पर जैन समाज की सर्वोच्च साध्वी गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी की पावन प्रेरणा से एवं जगद्गुरु पीठाधीश स्वस्तिश्री रविन्द्रकीर्ति स्वामी की अध्यक्षता व कुशल निर्देशन में विशाल जिनमन्दिर निर्मित हो चुके हैं। जिन मन्दिरों में विशाल भगवान की प्रतिमाएँ विराजमान की जा चुकी है। जोकि देश, विदेश से आने वाले भक्तों का मनमोह लेती हैं, भगवान की जन्मभूमि का स्पर्श करके विशेष आनन्द की अनुभूति होती है एवं विशेष पुण्य का सम्पादन होता है।

जैन समाज की सर्वोच्च साध्वी गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी ने पाँच सौ ग्रंथों का सृजन अपनी लेखनी के द्वारा किया, अनेक तीर्थों के जीर्णोद्धार एवं विकास की प्रेरणा प्रदान की। इसी क्रम में पूज्य माताजी की प्रेरणा से 24 तीर्थंकर भगवन्तों की जन्मभूमियों का विकास किया गया जिसमें मुख्य रूप से अयोध्या, हस्तिनापुर, काकंदी, कुण्डलपुर, राजगृही, कौशाम्बी आदि अनेक तीर्थों का विकास कार्य किया गया, नासिक जिले में स्थित मांगीतुंगी तीर्थ पर भगवान ऋषभदेव की 108 फुट उत्तुंग प्रतिमा निर्माण ऋषभगिरि पर्वत पर किया गया। जो कि गिनीजबुक ऑफ रिकार्ड में दर्ज हुई एवं इसी श्रृंखला में शाश्वत तीर्थ अयोध्या के विकास का क्रम प्रारम्भ है, इसी के अन्तर्गत 30 अप्रैल से 5 मई तक तीस चौबीसी के 730 भगवन्तों की एवं भगवान ऋषभदेव के चक्रवर्ती भरत एवं बाहुबली सहित 101 पुत्रों का, व चक्रवर्ती भगवान भरत स्वामी के 31 फुट प्रतिमा का प्राण प्रतिष्ठा एवं महामस्तकाभिषेक, भव्य विश्वशांति महायज्ञ का कार्यक्रम विशाल राष्ट्रीय स्तर पर सम्पन्न किया जा रहा है, एवं चौमुखी विकास की श्रृंखला में अनेक कार्य विकास के सम्पन्न होने हैं, परमपूज्य प्रज्ञाश्रमणी आर्यिका चन्दनामती माताजी के कुशल मार्गदर्शन में सम्पूर्ण कार्यक्रम सम्पन्न किया जाना है। सम्पूर्ण महोत्सव में प्राणप्रतिष्ठा के सम्पूर्ण विधि विधान का कार्यक्रम संहितासूरि प्रतिष्ठाचार्य श्री विजय कुमार जैन जम्बूद्वीप, हस्तिनापुर एवं उनकी टीम के द्वारा 6 एवं 7 मई में महामस्तकाभिषेक सम्पन्न किया जाएगा, जिसमें देश एवं विदेश के अनेकों जैन श्रृद्धालुओं के पहुँचने की सूचनाएँ प्राप्त हो रही है, अनेक राजनेताओं के भी आने की सम्भावना है। तीर्थ का विकास अर्थात् अयोध्या का विकास है इस विकास में सभी को जुड़कर पुण्य उपार्जन करना है।

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