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: भक्त परिस्थियों का गुलाम नही होता है: राधेश्याम शास्त्री

बमबम यादव

Thu, Apr 27, 2023

भागवत कथा के चतुर्थ दिवस आचार्य जी ने ध्रुव और प्रह्लाद की भक्ति प्रसंग सुनाया

अयोध्या। हनुमत किला गहोई मंदिर में भागवत कथा के चतुर्थ दिवस व्यासपीठ से कथा कहते अन्तर्राष्ट्रीय कथावाचक आचार्य राधेश्याम शास्त्री ने ध्रुव और प्रह्लाद की भक्ति का प्रसंग सुनाया। उन्होंने कहा कि जीवन का आरम्भ सकामता से हो, समापन निष्कामता से हो। भगवान कहते हैं ध्रुव पहले प्राप्त करो, फिर त्याग करो।ध्रुव लेने से मना करते हैं। भगवान लेने के लिए राजी कर लेते हैं। शास्त्री जी ने कहा कि भक्ति प्रतीक्षा है, प्रयास नहीं। भक्ति समर्पण है, संकल्प नहीं।भक्ति का मूल आधार ही, सांसारिक मन पर घात हो जाये। कथा क्रम को गति देते हुए महाराज जी ने कहा कि विभूति योग का वर्णन करते हुए श्रीकृष्ण श्रीमद् भगवद् गीता में कहते हैं।प्रह्लाद जन्मे तो दैत्यों के घर में। लेकिन घर में जन्मने से कुछ भी नहीं होता।

घर बंधन नहीं है। प्रह्लाद दैत्य वंश‌ में जन्मते हैं और परम भक्ति को उपलब्ध हो जाते हैं। जो पवित्र घरों में जो जन्मे हैं, वे भी इतनी बड़ी भक्ति को उपलब्ध नहीं हो पाते हैं। बेन, कंस, शिशुपाल, दुर्योधन, ये सब तो पवित्र वंश मे ही जन्मे थे।आप कहां पैदा हुए हैं, किस परिस्थिति में पैदा हुए, यह बेमानी है, लोग यही रोना रोते रहते हैं कि परिस्थिति ही ऐसी है, क्या करें? भक्त परिस्थियों का गुलाम नही होता है।जो गुलाम नही होता वही भक्त है। महाराज जी ने कहा कि एक आदमी चोर है, तो इसलिए चोर है, क्योंकि परिस्थिति ऐसी है।और एक आदमी हत्या करता है, तो मनोवैज्ञानिक कहते हैं, वह क्या कर सकता है! उसकी बचपन से सारी अपब्रिगिग, उसका पालन—पोषण जिस ढंग से हुआ है, उसमें वह हत्या ही कर सकता है।

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