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: 1800 प्रतिमाओं का पंचकल्याणक संस्कार महोत्सव का हुआ भव्य शुभारंभ

बमबम यादव

Mon, Mar 3, 2025
1800 प्रतिमाओं का पंचकल्याणक संस्कार महोत्सव का हुआ भव्य शुभारंभ तीर्थंकरों के साथ ऋषभदेव के 101 पुत्रों की प्रतिमाएं होंगी प्रतिष्ठित,भगवान ऋषभदेव के गर्भधारण की बेला में उत्सव मनाने के लिए शामिल हो रहे जीवन, संस्कार और देशना के प्रसाद स्वरूप संपूर्ण मानवता का अभिषेक है: साध्वी गणिनी प्रमुख ज्ञानमती माता अयोध्या।श्री दिगंबर जैन मंदिर की शीर्ष पीठ रायगंज स्थित भगवान ऋषभदेव के मंदिर में पंच कल्याणक प्रतिष्ठा महोत्सव के अंतर्गत 30 विभिन्न काल एवं लोक में हुए सभी 24 तीर्थंकरों की 720 प्रतिमाओं, भगवान ऋषभदेव के सभी 101 पुत्रों की प्रतिमाओं तथा कर्म के अनुसार विभिन्न लोकों में गति प्राप्त करते प्रसंगों की 727 प्रतिमाओं सहित कुल 1800 प्रतिमाओं का पंचकल्याणक संस्कार रविवार 2 मार्च से प्रारंभ हो गया है जो 6 मार्च तक चलेगा और इस संस्कार के फलस्वरूप पाषाण की प्रतिमाएं श्रद्धालुओं के लिए चिन्मय-चैतन्य हो उठेंगी। इन प्रतिमाओं के लिए जैन मंदिर के विशाल प्रांगण में तीन भव्य मंडप बनाए गए हैं। एक साथ एक हजार आठ सौ प्रतिमाओं की प्राण प्रतिष्ठा के दुर्लभ अवसर मंदिर के विशाल प्रांगण में पग-पग पर दिखाई दे रहा है और देश के विभिन्न हिस्सों से आए हजारों श्रद्धालु पूरे भाव से उत्सव में शामिल हो रहे हैं। उत्सव में सैकड़ों दंपती पौराणिक पटकथा के अनुसार इंद्र-इंद्राणी का स्वरूप ग्रहण कर भगवान ऋषभदेव के गर्भधारण की बेला में उत्सव मनाने के लिए सन्नद्ध होते हैं।तो उन युवक-युवतियों की संख्या इंद्र-इंद्राणियों का स्वरूप धारण किए श्रद्धालुओं से कई गुणा अधिक होती है, जो पूरी शास्त्रीयता और अवसर की भावना के अनुरूप मर्यादित नृत्य की प्रस्तुति से पंच कल्याणक महोत्सव का आनंद परिभाषित कर रहे होते हैं। रविवार को सुबह छह बजे ही भगवान ऋषभदेव के उत्सव विग्रह के पंचामृत अभिषेक से प्रारंभ होता है और देखते-देखते जैन मंदिर के 25 बीघा का प्रांगण आस्था, आदर्श, विश्वास, वैभव और भावना तथा भक्ति से तरंगायित हो उठता है। अभिषेक के बाद जैन धर्म की सर्वोच्च साध्वी गणिनी प्रमुख ज्ञानमती माता के उद्बोधन में बताया कि भगवान श्री तो अपने अपूर्व, अद्भुत, अलौकिक और अनंत तपश्चर्या से शाश्वत अभिषिक्त हैं, वस्तुत: यह अभिषेक उनके माध्यम से- उनके जीवन, संस्कार और देशना के प्रसाद स्वरूप संपूर्ण मानवता का अभिषेक है। हम संकल्पित हों उनके बताए रास्ते पर बढ़ने के लिए स्वयं के मस्तिष्क-प्रज्ञा और विवेक को इसके लिए तैयार कर सकें।परम पद को प्राप्त तीर्थंकर तो वापस इस जगत में नहीं आते, किंतु हमारे लिए उनकी प्रेरणा ही बहुत काम आ सकती है। उन्होंने इस अवसर को विश्व शांति और अहिंसा की प्रतिष्ठा का भी बताया।1800 प्रतिमाओं की प्रतिष्ठा का महापर्व विश्व में अहिंसा और शांति की स्थापना के संकल्प का है। अभिषेक के बाद सैकडों महिलाएं सिर पर मंगल कलश के साथ उस मंडप में प्रवेश करती हैं, जिसे स्वर्ग की तरह सज्जित किया गया होता है। कलश स्थापना और अखंड दीप के प्रज्वलन से यह संकल्प और घनीभूत होता है। अभिषेक कलश यात्रा के बाद दूसरी बेला में विभिन्न धार्मिक उपक्रमों एवं कर्मकांडों के माध्यम से भगवान का गर्भ कल्याणक सम्पन्न हुआ और दिगंबर जैन मंदिर तीर्थ क्षेत्र कमेटी के अध्यक्ष एवं पीठाधीश रवींद्रकीर्ति स्वामी ने अपने उद्बोधन में बताया कि गर्भ कल्याणक जैसे महत्वपूर्ण अनुष्ठान में सहभागी बनने का अवसर भगवान ऋषभदेव को आत्मस्थ करने का अवसर है। जैन दर्शन के तरफ ध्यान आकृष्ट कराते हुए उन्होंने कहा कि आज नहीं तो कल हमारे सत्कर्म उन ऊंचाइयों तक पहुंच सकते हैं, जहां से हम भी भगवान ऋषभदेव की तरह मोक्षगामी हो सकें, किंतु अभी हम उन्हें आत्मस्थ कर उनके मूल्यों और आदर्शों के साथ जीवन जीने का गौरव तो हासिल ही कर सकते हैं।

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