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: श्रीसीताराम विवाह केवल उत्सव नही रसिकों का उपास्य है: रामदिनेशाचार्य

बमबम यादव

Sat, Dec 7, 2024
श्रीसीताराम विवाह केवल उत्सव नही रसिकों का उपास्य है: रामदिनेशाचार्य
चक्रवर्ती सम्राट राजा दशरथ जी के राज महल बड़ा स्थान में निकली भगवान राम की राजशी बारात, राजा दशरथ बन बिंदुगाद्याचार्य स्वामी देवेंद्रप्रसादाचार्य जी महाराज लुटा रहें थे नेग
कार्यक्रम के संयोजक सुंदर सदन पीठाधीश्वर महंत कृपालु राम भूषण दास बारातियों का कर रहें थे अभिनन्दन
अयोध्या। रामनगरी में सीताराम विवाहोत्सव आज अपने चरम रहा। हर तरफ भगवान राम के बारात में शामिल होने के लिए लोगों में होड़ मची रही। रामकोट स्थित चक्रवर्ती सम्राट राजा दशरथ जी के राज महल बड़ा स्थान में राम बारात निकलने से पहले रामकथा में भक्तों की भारी भीड़ उमड़ी। राम कथा के षष्ठम् दिवस जगद्गुरु रामानन्दाचार्य स्वामी रामदिनेशाचार्य ने कहा कि श्रीसीताराम विवाह केवल उत्सव नही रसिकों का उपास्य है।जहां उपासक काल के बंधन से ऊपर उठकर उपास्य से तादात्म्य स्थापित करके स्वयं को उस काल में पहुँचा देता है। श्रीसीताराम जी के विवाह की लीला महामंगल की लीला है जिसके श्रवण-दर्शन से जीवन मंगलमय होता है। उन्होंने कहा कि भगवान श्रीसीताराम जी के विवाह ने ही दुनिया को विवाह संस्कार का आदर्श सिखलाया। भारतीय संस्कृति में श्रीराम-सीता आदर्श दंपति हैं। जगद्गुरु जी ने कहा कि श्रीरामचन्द्रजी के दूलह-वेष पर रसिक जन निछावर हो जाते हैं। प्रभु का श्याम शरीर स्वाभाविक सुन्दर एवं कोटि काम की शोभा को लज्जित करने वाला है।महावर से युक्त चरण शोभा दे रहे हैं जिनमें मुनियों के मनरूपी मधुप छाये रहते हैं। कटि में पुनीत पीत धोती,कर मुद्रिका चित्त को चुरा लेती है।ब्याह के साज से शोभित हैं।छाती चौड़ी है उसपर उरभूषण विराजमान है।मणि मोती मण्डित पीला दुप्पट्टा काखाँ-सोती पड़ा है।कानों में कुण्डल,भृकुटी सुन्दर,नासिका मनोहर,मस्तक पर तिलक सुन्दरता का निवास स्थान है।माथे पर मंगलमय मणि मुक्ताओं से गुँथा हुआ मौर सोह रहा है।सुन्दर मौर में महामणि गुँथे हुये हैं।सभी अंग चित्त को चुराने वाले हैं।रामानन्दाचार्य जी ने कहा कि विवाह ऐसा संस्कार है जिसे प्रभु श्रीराम और कृष्ण ने भी अपनाया। भगवान राम ने अहंकार के प्रतीक धनुष को तोड़ा। यह इस बात का प्रतीक है कि जब दो लोग एक बंधन में बंधते हैं तो सबसे पहले उन्हें अहंकार को तोड़ना चाहिए और फिर प्रेम रूपी बंधन में बंधना चाहिए। यह प्रसंग इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि दोनों परिवारों और पति-पत्नी के बीच कभी अहंकार नहीं टकराना चाहिए क्योंकि अहंकार ही आपसी मनमुटाव का कारण बनता है।महोत्सव की अध्यक्षता बिंदुगाद्याचार्य स्वामी देवेंद्रप्रसादाचार्य जी महाराज कर रहें व दिव्य संचालन मंगल भवन व सुंदर सदन पीठाधीश्वर महंत कृपालु राम भूषण दास कर रहें। कथा में सौकड़ों संत साधक मौजूद रहें। कथा से पूर्व दशरथ राजमहल बड़ा स्थान में विशाल भंडारे का आयोजन किया गया जिसमें अतिथियों का स्वागत बिंदुगाद्याचार्य जी के उत्तराधिकारी कृपापात्र शिष्य मंगल भवन पीठाधीश्वर महंत रामभूषण दास कृपालु जी ने किया। आज की कथा में कैसरगंज के लोकप्रिय नेता बृजभूषण शरण सिंह व अयोध्या के लोकप्रिय नेता पूर्व मंत्री तेजनारायण पाण्डेय पवन शामिल होकर संतों का आशीर्वाद लिये। इस मौके पर महंत बलराम दास, सोनू सिंह, जेडी सिंह, निलेश, गुरुदेव पैलेस के रवि सिंह, अयोध्या एकेडमी के प्रदीप तिवारी, अमरजीत सिंह काका, प्रियेश दास, अयोध्या प्रभारी महेंद्र त्रिपाठी सहित बड़ी संख्या में संत साधक मौजूद रहें।

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