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: जो साक्षात भगवान जी के दर्शन करायें वही संत, इन्द्रदेवजी की कथा वर्षा परम् आनंद देती है: बिंदुगाद्याचार्य

बमबम यादव

Wed, Apr 6, 2022

यज्ञपीठाधीश्वर विद्यावाचस्पति संत इन्द्रदेवजी सरस्वती जी महाराज के कथा मंडप में उमड़े अयोध्या के साधु संत

संत सम्मेलन को सम्बोधित करते अधिकारी राजकुमार दास जी महाराज

हुआ विशाल संत सम्मेलन, वृहद भंडारे के साथ सभी का हुआ अभिनन्दन

व्यासपीठ से कथा कहते संत इन्द्रदेवजी सरस्वती जी महाराज

अयोध्या। यज्ञपीठाधीश्वर विद्यावाचस्पति संत इन्द्रदेवजी सरस्वती जी महाराज द्वारा निसृत मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम की कथा पारायण के आज पंचम दिवस की कथा में रामनगरी अयोध्या संत धर्माचार्यों का विशाल सम्मेलन हुआ। जिसमें रामनगरी के सभी संत शामिल हुए। श्री दशरथ महल बड़ी जगह के श्री बिंदुगाद्याचार्य स्वामी देवेन्द्र प्रसादाचार्य ने कहा कि कथा व्यास जी अनेक शास्त्रों के मर्मज्ञ हैं, जिस प्रकार इन्द्रदेव द्वारा वर्षा अधिक हो जाता है तो समस्या हो जाती है, लेकिन सन्त इन्द्रदेवजी द्वारा कथा की वर्षा परम् आनंद देती है।उन्होंने कहा कि सन्त 2 प्रकार के होते हैं पहले वे जो साधना बताते हैं, ये बताते हैं कि साधना कैसे करना चाहिए?  और दूसरे वो हैं जो भगवान का दर्शन करवाते हैं जो साक्षात भगवान जी के दर्शन करा देते हैं। सन्त इन्द्रदेवजी दूसरे प्रकार के ही संत हैं। जिस दिन राम का जन्मोत्सव होता है उस दिन सारे तीर्थ अयोध्या जी में आ जाते हैं।जो कथा सुनने आते हैं, वो भी सन्त समान ही है।
यज्ञपीठाधीश्वर विद्यावाचस्पति संत इन्द्रदेवजी सरस्वती जी महाराज के श्री मुख से कथा ही नहीं अपितु भगवत दर्शन करने भारत भर से पधारे समस्त भक्तजन कथा पंडाल में पधारकर भगवत कथा में सराबोर हो रहे हैं। अयोध्या जी में पधारे अन्य-अन्य स्थानों पर कथा सुनने आए श्रोता भी इस कथा रस का लाभ ले रहे हैं।
संत इन्द्रदेवजी सरस्वती जी महाराज ने आज पंचम दिवस की कथा में बताया कि भगवान की भक्ति में सहजता आवश्यक है।
चतुर व्यक्ति भक्ति में नहीं चलता।जो प्रणाम करने का शौक पैदा कर लेते हैं उसकी आयु, विद्या यश और बल बढ़ते हैं। प्रणाम करने से बल बढ़ता है। जिसकी स्थिरता समाप्त हो जाती है, उसके साथ प्रयोग भी समाप्त हो जाते हैं, अतः हमारी स्थिरता कभी समाप्त नहीं होनी चाहिए। चालाक व्यक्ति कृपा पात्र नहीं बन सकता। दुनिया के किसी भी कोने में जाएं ध्यान और दर्शन अवश्य करें। परमात्मा की छड़ी हर समय हमपर रहनी चाहिए, ताकि हम गलत कर्म न करें। गुरुदेव के ऊपर छोड़ देना चाहिए, वे हमारा कैसा ऑपरेशन कैसा करेंगे। हमने बचपन में रूप यदि भगवान सा बना रखा है, तो जवानी में भी ऐसा ही रूप बनाए रखिए। गुरु की आज्ञा से खर्च करोगे तो आपका धन सदा बढ़ता ही चला जाएगा। जिस कंठ से कथा निकलती है इस कंठ में तंबाकू नहीं जानी चाहिए, जिस प्रकार यज्ञ में कोई कचरा नहीं डाला जाता, उसी प्रकार कथा भी एक यज्ञ है, उस मुख में कचरा न डालें। जब तक कथा जीवन में न उतरेगी, तब तक केवल कथा कहने का कोई लाभ नहीं है। दर्शन करने से थक जाते हो तो समझो दर्शन सच्चे नहीं है, बल्कि दर्शन करने से थकान उतर जाती है। गुरु अनुभवी ही बनाना चाहिए। जिसने वेदों के एक लाख वेद मंत्र, अथवा बीस हज़ार मंत्र कंठस्थ किए हों वही गुरुदीक्षा देने का अधिकारी है।
सन्त जी ने बताया कि भगवान के दर्शन "निकट से भी निकट और
दूर से भी दूर है
नज़र से भी नज़र न आए
यह तो नज़र का कसूर है.."
साथ ही आज ही संध्याकाल 4 बजे कनक महल, अयोध्या जी में समस्त संतों का महासम्मेलन एवं भव्य साधु भोज का आयोजन हुआ है।

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